रसमंजरी 'रामचरित मानस में रस निरूपण' शोध पत्र की भूमिका लिखने का अवसर लेखिका अरुणा आभा पाठक जी ने मुझे देकर एक महती ज़िम्मेदारी सौंपी है जिसका न्यायपूर्ण निर्वहन करने का पूर्ण प्रयास है।
एक गंभीर और पौराणिक विषय पर आधारित इस शोधपत्र की प्रफ रीडिंग के दौरान इसे अध्ययन करने का मुझे पूरा अवसर मिला।
मैं अपने को सौभाग्यशाली समझती हूँ कि अरुणा आभा पाठक जी ने मुझ पर विश्वास किया और इस पुस्तक के संशोधन (वर्तनी और व्याकरण) के लिए मुझे चुना। तब मुझे हैरानी हुई कि एक स्कूल अध्यापिका क्या इतनी बड़ी जिम्मेदारी के योग्य हो सकती है? हालांकि अब तक के जीवन का आधा हिस्सा पठन-पाठन में ही व्यतीत हुआ है। 36 वर्षों तक इंटरमीडिएट तक की हिंदी भाषा के अध्यापकीय काल में भाषा में वर्तनी और व्याकरण पर मेरा विशेष ध्यान रहा है। सेवानिवृत्ति के पश्चात परिणाम स्वरूप कई कवियों के काव्य संग्रहों का संशोधन और समीक्षा का अवसर मुझे अब तक प्राप्त हो चुका है। शायद यही कारण रहा होगा कि शोध पत्र जैसे गंभीर पांडुलिपि की भी जिम्मेदारी मुझ जैसे साधारण सी अध्यापिका को निर्वहन करने का अवसर प्राप्त हुआ।
पांडुलिपि के संशोधन में मुझे लगभग दो से तीन महीना लग गया। लेकिन एक अच्छी बात ये रही कि इस गंभीर कार्य को करते हुए मैंने भली-भांति इस शोध-पत्र में उद्धृत चौपाइयों का भी अध्ययन गहराई से किया है। अपनी क्षमता के अनुकूल मैंने बारीकी से अपने जिम्मेदारी को निभाने का प्रयास किया है। फिर भी त्रुटियों तो रह ही जाती हैं चाहे मिसप्रिंटिंग हो प्रकाशक की ओर से या अपनी भूल के कारण हो।